Essay Swadesh Prem Hindi Language

स्वदेश प्रेम

निबंध नंबर : 01 

स्वदेश का अर्थ है अपना देश अर्थात अपनी मातृभूमि | यह वह स्थान होता है जहाँ हम पैदा होते है, पलते है और बड़े होते है | जननी तथा जन्मभूमि की महिमा का स्वर्ग से बढकर बताया गया है | जिस देश में हम जन्म लेते है तथा वहाँ का अन्न, जल, फल, फूल आदि खाकर हम बड़े होते है उसके ऋण से हम उऋण नही हो सकते है | मातृभूमि के महत्त्व को संस्कृति की इस कहावत में वर्णित किया है – ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात जन्म देकर पालन-पोषण करने तथा प्रत्येक आवश्यक वस्तु प्रदान करने वाली मातृभूमि का महत्त्व तो स्वर्ग से भी बढ़ कर है | यही कारण है कि स्वदेश से दूर जाकर मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी भी एक प्रकार की उदासी व रुग्णता (Home sickness) का अनुभव करने लगते है |

स्वदेश प्रेम मानव में ही नही, पशु –पक्षियों तथा किट – पतंगो में भी निरन्तर तरंगित होता रहता है | पशु-पक्षी दिन भर दूर-दूर तक विचरण करने के बाद सांय को सूर्यास्त के बाद अपने – अपने स्थानों को लौट आटे है | विदेश में बैठे हुए व्यक्ति भी स्वदेश-प्रेम से पीड़ित रहते है | अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता और रक्षा के सामने व्यक्ति अपने प्राणों तक के महत्त्व को तुच्छ मान लेता है | वह अपनी सभी सुख – सुविधाएँ यहा तक कि अपने प्राण भी उस पर न्यौछावर कर देने से नही झिझकता |

विश्व में अनेक ऐसे नर-रत्न हुए है जिन्होंने स्वदेश प्रेम के कारण हँसते हँसते मृत्य का आलिंगन किया है | इसी स्वदेश प्रेम की भावना से प्रेरित होने पर महाराणा प्रताप ने अनेको कष्ट शे तथा शहीद भगतसिंह हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे पर झूल गे थे | देश की रक्षा के लिए अपने तन-मन को न्यौछावर कर देने वाले व्यक्ति अमर हो जाते है | इसी स्वदेश प्रेम के कारण राष्ट्रपिता गाँधीजी ने अनेको कष्ट सहे, जेलों में गए तथा अन्त में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए | पं. जवाहर लाल नेहरु जी ने भी इसी राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत –प्रोत होकर अपने राजसी सुखो का त्याग कर दिया | इनके अतिरिक्त छत्रपति शिवाजी , रानी लक्ष्मीबाई , तांत्या टोपे, गुरु गोविन्दसिंह आदि वीरो ने भी हँसते- हँसते स्वदेश की रक्षा में अपने प्राण अर्पित कर दिए | जिस देश में ऐसे सच्चे देशभक्त होते है, उस देश का कोई बाल भी बांका कैसे कर सकता है ? हमारे देश की धरती अपने इन महान वीरो की स्मृति को अपने ह्रदय से छिपा कर रखेगी |

अंत : हम जिस देश में जन्म लेते है, पलते है तथा बड़े होते है उसके प्रति हमारा विशेष कर्त्तव्य हो जाता है | उस देश से हमे सच्चे ह्रदय से प्रेम करना चाहिए | तथा उसकी प्रगति के लिए अथक प्रयास करना चाहिए | यदि देश पर आपत्ति आती है तो हमे तन, मन और धन से सदैव तत्पर रहना चाहिए | यही कम सबका कर्त्तव्य है |

 

निबंध नंबर –  02 

 

स्वदेश प्रेम

प्रस्तावना सारे संसार के लोगों में स्वदेश प्रेम का बहुत महत्व है। हम भारतवासियों में तो इसका महत्व कुछ और भी अधिक है। हमारे देश में तो माता और जन्मभूमि की महिमा को स्वर्ग से भी बढ़कर वताया गया है। जिस देश में हम जन्म लेते हैं, जिस देश की मिट्टी में पलकर बड़े होते हैं, जिस देश का अन्न, जल, फल, फूल, खाकर बड़े होते हैं, उसके ऋण से हम कभी मुक्त नहीं हो सकते। अत: हमें अपने देश की अधिक-से-अधिक सेवा वरनी चाहिये।

जन-जन में स्वदेश प्रेम की भावना-स्वदेश प्रेम मनुष्यों में ही नहीं, अपितु कीट-पतंगों एवं पशु-पक्षियों में भी होता है। विदेश में बैठे व्यक्ति भी स्वदेश प्रेम से पीड़ित रहते हैं। स्वदेश प्रेम की भावना से प्रेरित होने पर ही महाराणा प्रताप ने अनेकों कष्ट सहे, शहीद भगत सिंह हँसते-हँसते फांसी के फन्दे पर झूल गये। गाँधी जी ने भी अनेक कष्ट सहे, पर स्वदेश प्रेम पर अडिग रहे।

पं० नेहरू जी ने भी इसी भावना से ओत-प्रोत होकर अपने राजस्व को त्यागा। उन्होंने स्वदेशी को अपनाया। इनके अलावा अन्य कई महापुरुषों ने इसी स्वदेश प्रेम के कारण अपने-अपने प्राणों का वलिदान दिया। अत: जो इस प्रकार अपने देश के लिए अपना तन मन सच न्यौछावर कर देते हैं,  वे मरकर भी अमर हो जाते हैं।

उपसंहार – हमें भी अपने देश के लिए अथक प्रयास करने चाहियें। यदि देश पर विपति आती है तो हमें तन, मन, धन से सदैव उसकी रक्षा करनी चाहिये। यही सच्चा स्नश प्रेम हैं। स्वदेश का अर्थ है अपना देश। अपना देश वह है जहां इन्सान रहता हैं, जन्म लेता है जहां उसका पालन-पोषण होता है। जलयान पर रहने वाले पक्षी के लिए जलयान ही उसका ‘स्वदेश’ होता है। जलयान अथाह सागर में पड़ा डोलता और लहरों का सफर करता रहता है। जहाज का पंछी उड़कर, धूमधाम कर पुन: जहाज पर आकर बसेरा करता है। इसीलिए कहा गया है-‘ज्यों जहाज का पंछी, उड़ पुनि जहाज पर आवे।’ जब एक पंछी की यह प्रकृति है तो हम तो इन्सान हैं। हमें अपने देश से और भी अधिक प्रेम होना चाहिये। हमारा यह परम कर्तव्य होना चाहिये कि देश किसी आपदा में हो तो पूरे देश के नागरिक देश की आपदा को स्वयं की आपदा मानें और ऐसा देशवासियों ने पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश युद्ध के समय कर दिखाया। देश के वीर जवानों के लिए युवाओं ने अपना खून दिया तो महिलाओं ने अपने शरीर के आभूषण उतारकर देश की झोली में डालकर अपने स्वदेश प्रेम की भावना प्राणप्रण से उजागर की।

February 17, 2017evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), Languages7 CommentsHindi Essay, Hindi essays

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देश प्रेम 

या 

स्वदेश प्रेम

 

जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं

वह हृदय नहीं है, पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यान नहीं।

विश्व में ऐसा तो कोई अभागा ही होगा जिसे अपने देश से प्यार न हो। मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी अपने देश या घर से अधिक समय तक दूर नहीं रह पाते। सुबह-सवेरे पक्षी अपने घोसले से जाने कितनी दूर तक उड़ जाते हैं दाना-दुनका चुगने के लिए पर शाम ढलते ही चहचहाता हुआ वापस अपने घोसले में लौट आया करता है। एक नन्हीं सी चींटी भ अपने बिल से पता नहीं कितनी दूर चली जाती है उसे भी अपने नन्हें और अदृश्य से हाथों या दांतों में चावल का दाना दबाए वापस लौटने को बेताब रहती है ये उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी तक स्वदेश-प्रेमी हुआ करते हैं।

देश अपने आप में होता एक भू-भाग ही है। उसकी अपने कुछ प्राकृतिक और भौगोलिक सीमांए तो होती ही हैं, कुछ अपनी विशेषतांए भी हो सकती हैं बल्कि अनावश्यक रूप से हुआ ही करती है। वहां के रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, भाषा और बोलचाल, धार्मिक-सामाजिक विश्वास और प्रतिष्ठान, संस्कृति का स्वरूप और अंतत: व्यवहार सभी कुछ अपना हुआ करता है। यहां तक कि वर्तन, नदियां झाने तथा जल के अन्य स्त्रोत, पेड़-पौधे और वनस्पतियां तक अपनी हुआ करती हैं। देश या स्वदेश इन्हीं सबसे समन्वित स्वरूप को कहा जाता है। इस कारण स्वदेश प्रेम का वास्तविक अर्थ उस भू-भाग विशेष पर रहने औश्र मात्र अपने विश्वासों और मान्यताओं के अनुसार चलने-मानने वालों से प्रेम करना ही नहीं हुआ करता, बल्कि उस धरती के कण-कण से धरती पर उगने वाले पेड़-पौधों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों ओर पत्ते-पत्ते या जर्रे से प्रेम हुआ करता है। जिसे अपनी मातृभूमि से स्नेह, वह तो मनुष्य कहलाने लायक ही नहीं है।

‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है वह नर नहीं है, पशु गिरा है, और मृतक समान है।’

श्री राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को कहा था कि मुझे यह सोने की लंका भी स्वदेश से अच्छी नहीं लगती। मां और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान लगते हैं।

अपिस्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते

जननी जन्मभूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी’

उपर्युक्त पंक्तियों में श्री राम ने स्वदेश का महत्व स्पष्ट किया है। यदि मां हमें जन्म देती है तो मातृभूमि अपने अन्न-जल से हमारा पालन-पोषण करती है। पालन-पोषण मातृभूमि वास्तव में स्वर्ग से भी महान है। यही कारण है कि स्वदेश से दूर जाकर व्यक्ति एक प्रकार की उदासी और रूगणता का अनुभव करने लगता है। अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता और रक्षा के सामने व्यक्ति अपने प्राणों तक का महत्व तुच्छ मान लेता है। अपना प्रत्येक सुख-स्वार्थ, यहां तक कि प्राण भी उस पर न्यौछावर कर देने से झिझकना नहीं। बड़े से बड़ा त्याग स्वदेश प्रेम और उसके मान सम्मान की रक्षा के सामने तुच्छ प्रतीत होता है। जब देश स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहा था। तब नेताओं का एक संकेत पाकर लोग लाठियां-गोलियां तो खाया-झेला ही करते थे, फांसी का फंदा तक गले में झूल जाने को तैयार रहा करते थे। अनेक नौजवान स्वदेश प्रेम की भावना से प्रेरित होकर ही जेलों में सड़-गल गए फांसी पर लटक गए और देश से दर-बदर होकर काले पानी की सजा भोगते रहे।

स्वदेश प्रेम वास्तव में देवी-देवताओं और स्वंय भगवान की भक्ति-पूजा से भी बढक़र महत्वपूर्ण माना जाता है। घ्ज्ञक्र से सैंकड़ों-हजारों मील दूर तक की हड्डियों तक को गला देने वाली बर्फ से ढकी चौटियों पर पहरा देकर सीमों की रक्षा करने में सैनिक ऐसा कुछ रुपये वेतन पाने के लिए ही नहीं किया करते बल्कि उन सबसे मूल में स्वदेश-प्रेम की अटूट भावना और रक्षा की चिंता भी रहा करती है। इसी कारण सैनिक गोलियों की निरंतर वर्षा करते टैंकों-तोपों के बीच घुसकर वीर-सैनिक अपने प्राणों पर खेल जाया करते हैं। स्वदेश प्रेम की भावना से भरे लोग भूख-प्यास आदि किसी भी बात की परवाह न कर उस पर मर मिटने के लिए तैयार दिखाई दिया करते हैं।

June 13, 2017evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo CommentHindi Essay, Hindi essays

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